दक्षिण में दम तोड़ती हिंदी
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By Admin
Published - 24 March 2025 14 views
स्वतंत्र पत्रकार विजन
पी एन पाण्डेय
देवनागरी उत्थान फाउंडेशन की सह संस्थापक डॉक्टर प्रमिला पाठक करीब 45 वर्षों से हिंदी की सेवा में मैं रत हैं
इनका कहना है कि जब मैं पहली बार हैदराबाद आई थी 40 साल पहले तब बहुत स्वस्थ वातावरण था सभी भाषाओं का समान सम्मान था और विद्यालय में पढ़ाना बहुत अच्छा लगता था बड़े मन से हिंदी पढ़ती थी जब मेरे पढ़ाए हुए बच्चे 10th करने के बाद कॉलेज में हिंदी को भाषा के रूप में लेते थे तो उनके अध्यापक उनसे पूछते थे कि तुम्हें हिंदी किसने पढ़ाई । 20 साल तक हिंदी पढ़ाने के बाद इन्होंने हिंदी भाषा के मुख्य अध्यापिका यानी आर एंड डी के पद को संभाल और 25 वर्षों से अध्यापकों और अध्यापिकाओं को प्रशिक्षण देना और बच्चों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करना तैयार करना प्रश्न पत्र टेक्सटबुक्स आदि तैयार करना बुक रिव्यू करना अभी ऐसे ही बहुत सारे कार्य हैं जिन्हें लेकर यह हिंदी के क्षेत्र में आगे बढ़े और हिंदी की सेवा की परंतु अब स्थिति बड़ी देनी हो गई है क्योंकि क्योंकि अब तेलंगाना सरकार ने हिंदी द्वितीय भाषा के स्थान पर सभी बच्चों को चाहे वह किसी भी भाषा के बोलने वाले हो तेलुगू को ही द्वितीय भाषा के रूप में अपने की जबरदस्ती उन पर ठोकने की कोशिश की है भला कोई बताएं की जो बच्चे शुरू से हिंदी को द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ रहे हैं वह अचानक आठवीं और दसवीं कक्षा में कैसे कैसे तेलुगू पढ़ पाएंगे और वंचिनी अंक प्राप्त कर सकेंगे ऐसे बच्चों को विशेष रूप से बहुत बड़े अन्याय का सामना करना पड़ रहा है जिनकी मातृभाषा तेलुगू नहीं है उन बच्चों के लिए विशेष रूप से यह बहुत बड़ा अन्याय है आजकल तो कुछ सालों से ऐसा देखा गया था की जिनकी मातृभाषा तेलुगु थी ऐसे माता-पिता भी अपने बच्चों को द्वितीय भाषा के रूप में पहली कक्षा से ही हिंदी पढ़ने में रुचि ले रहे थे उनका कहना था कि हमारे बच्चे तेलुगु तो घरों में सीख ही लेंगे विद्यालय में हिंदी सीखें तो हमें बहुत अच्छा लगेगा इस प्रकार अभी तक हिंदी के लिए बहुत स्वस्थ वातावरण चल रहा था तेलंगाना सरकार ने इस प्रकार तेलुगु को द्वितीय भाषा के रूप में अनिवार्य करके न केवल हिंदी की समाप्ति की घोषणा कर दी है बल्कि बच्चों और अभिभावकों की रुचियां अभिरुचियों के भी खिलाफ काम किया है अगर तेलुगू को अनिवार्य बनाना ही था तो हिंदी द्वितीय भाषा वाले बच्चों के लिए तृतीय भाषा के रूप में तेलुगू अनिवार्य कर सकते थे वैसे भी अनूप अनूप और एप एन एन ए ए पी त्रिभाषा सूत्र का यानी तीन भाषाओं के महत्व तीन भाषाओं को सीखने पर बल देने की बात कही गई थी आज नहीं तो कल नेप लागू करनी ही पड़ेगी और तीन भाषण पढ़ने का प्रावधान करना ही पड़ेगा पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी क्योंकि एक बार तृतीय भाषा में गया हुआ बच्चा द्वितीय भाषा पढ़ने में इतनी आसानी से सक्षम नहीं रह पाता है
विद्यार्थियों के साथ-साथ अध्यापकों और अध्यापिकाओं के लिए भी यह संकट का समय आ गया है परोक्ष रूप से यह हिंदी और हिंदी भाषा लोगों हिंदी भाषी लोगों दोनों का ही विरोध होता हुआ दिखाई देता है तृतीय भाषा के नाम पर मुश्किल से तीन या चार अंतराल दिए जाते हैं जिसमें बच्चों को तृतीय भाषा का कोर्स पूरा करना ही मुश्किल होता है तो उन्हें अच्छी तरह से पढ़ना और बोलना सीखना बहुत मुश्किल बात है वह भी केवल आठवीं कक्षा तक क्योंकि दसवीं में तो द्वितीय भाषा ही होगी और वह होगी तेलुगू
इसके अतिरिक्त जब बच्चे तृतीय भाषा हिंदी को जैसे तैसे पारकर कॉलेज में दाखिला लेता है तो वहां अधिक अंक लाने के लिए अधिकतर संस्कृत भाषा बच्चों के द्वारा चुनी जाती है जो की हिंदी वाली लिपि में ही होती है जब बच्चों ने हिंदी ही ठीक से नहीं पड़ी तो उनको संस्कृत पढ़ने में कितनी तकलीफ होने वाली है इसका अंदाजा ना तो सरकार को है नहीं अभिभावकों को और विद्यालयों के बड़े अफसर अफसर अफसर को बच्चों की मुश्किल कोई नहीं समझना चाहता
हिंदी और संस्कृत में जितना ज्ञान और जितना साहित्य देखने और पढ़ने को मिलता है उतना किसी और भाषा में नहीं इस हिसाब से भी बच्चे बहुत सारे साहित्य और ज्ञान से वंचित रह जाएंगे जो की ठीक नहीं है
चाहे वह राज्य की सरकार है यह विद्यालय के उच्च अधिकारी या फिर बच्चों के अभिभावक या माता पिता सब अपने हिसाब से सोच रहे हैं बच्चों की मानसिक स्थिति या दयनीय दशा के बारे में किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है
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